मंगल भवन अमंगल हारी – सुंदर कांड
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रब हू सो दशरथ अजीर बिहारी
जांवंत के वचन सुहए
सुनी हनुमंत हरदे आती भाए
तब लगी मोहि पारिखि तुम भाई
सही दुख कांड मूल फल खाए
जब लगी आमौ सितही देखी
होहि काज मोहि हर्ष विशेखी
यह कही नाही सबाहु माता
चलेऊ हर्षा हिए धरी रघुनता
ज़ीमे अमोघ रघुपति कर बना
अही भाटी चलेऊ हनुमना
जल निधि रघुपति दूत विचारी
टाई मैं नाथ होहि श्रम हारी
हनुमान तही परसा कर
पुनी कीन् प्रणाम
राम काजू कीने बीनू मोहि
कहा बिशराम
जात पवंसुत देवान्ह देखा
जानयि काहु बाल बुद्धि बिसेशा
सुरसा नाम अहिन्ह कई माता
पतनकी आई कही तही बाटा
आजू सुरनह मोहि दीन आहारा
सुनत बचन कह पवंकुमआरा
राम काजू करी फिरी मई आओ
सीता कई सुधि प्रभुही सुनावो
तब तव बदन पैथिहौ आई
सत्या काहऔ मोहि जान दे माई
कवानहू जतन दही नही जाना
ग्रसाई ना मोहि कहेऊ हनुमाना
सात जोजन तही आनन कीनन
आती लघु रूप पवन सूत लीनन
बदन बैठ पुनी बाहर आवा
माँगा तार सिर नावा
राम काजू तुम बाल बुद्धि निधान
आशीष देई दाई सो हर्षी चलेऊ हनुमान

