सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां
सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां
मैया सुधर नहीं मैं बिसारू राम की हो मां।।
हरन लड्डुआ चली चली मधुवन नार
उठ सीता भोजन करो लंका पे राज
सुधी नहीं बिसारू राम की हो मां
सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां।।
ऐसे भोजन ना करू रे मोहे नहीं रे सुहाए
मर जौ वास पे रहने जौ राम के पास
सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां
मैया सुधर नहीं मैं बिसारू राम की हो मां।।
ऐसी सीता सतवंति रे एक पुरुष की नार
एक पुरुष की नर काहे आई गढ़ लंका रहते राम के पास
सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां
मैया सुधर नहीं मैं बिसारू राम की हो मां।।
का कहु लक्ष्मण देवरा वचन लियो रे हारे
टीनो लोक एक छिन में लंका कौन दिशा में
सुध नहीं बिसारू मैं राम की हो मां
मैया सुधर नहीं मैं बिसारू राम की हो मां।।

