कोई दुनिया में आता है कोई दुनिया से जाता है
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है,
ये संसार मुसाफिर खाना है, यहाँ कौन ठहर पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है,
दाता है ऊपर वाला, हम सब तो बस कठपुतली हैं,
जितना उसने खेल रचाया, उतनी हीं अपनी हस्ती है,
पर्दा गिरते हीं रंगमंच का, खेल ख़त्म हो जाता है,
ये संसार मुसाफिर खाना है, यहाँ कौन ठहर पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है।
किराये के इस चोले पर, क्यों हक़ अपना बतलाता है,
मकान मालिक जब चाहेगा, पल में तुझे उठाता है,
बिना बताये खाली, एक हवा का झोंका आता है,
ये संसार मुसाफिर खाना है, यहाँ कौन ठहर पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है।
और इसे भी सुनें: संग ना जाए तेरे महल अटरिया
काया की ये नाव पुरानी, लहरों की बस मोहताज है,
अभिमान की इस पतवार से, आज डूब रहा इंसान है,
जो छोड़ दे सबकुछ सतगुरु पर, वो चुपके से तर जाता है,
ये संसार मुसाफिर खाना है, यहाँ कौन ठहर पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है।
दौलत की इस अंधी दौड़ में, तू सच्चा धन भूल गया,
कागज के चंद टुकड़ों पर, क्यों भीतर से टूट गया,
अंत समय में तिजोरी का, हर ताला बंद रह जाता है,
ये साँसों का व्यापार यहाँ, कोई समझ ना यहाँ पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है।
हाड़ मांश का ये पिंजरा, जिसमे एक पंक्षी सोता है,
उड़ जाता है जब वो नभ में, सारा कुनबा रोता है,
दाना पानी ख़तम हुआ तो, पंख लगा उड़ जाता है,
ये साँसों का व्यापार यहाँ, कोई समझ ना यहाँ पाता है,
कोई दुनिया में आता है, कोई दुनिया से जाता है।
