जब राम बिराजे मन में मेरे फ़िर घोर काली का डर कैसा

  • Jab Ram Biraje Man Me Fir Ghor Kali Ka Dar Kaise

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फिर घोर काली का डर कैसा ।।

जब अमृत सागर नाम पिया
फिर जग की जहर से दर कैसा।।
जब राम बिराजे मन में मेरे

वो कथा आजमिल की प्यारे
बटलाये प्रभु सबको तारे।।

बस आधे नाम से मनवा मेरे
खुल जाये द्वार उनके सारे।।

जब नाम का उजियाला फैलो
फिर मोह निशा से डर कैसा

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा
जब राम बिराजे।।

हो ध्रुव मीर प्रह्लाद सारे
अपने ही पराए हुए प्यारे।।

प्रति है संदेश ही एक
हरि नाम ही जो सब को तारे
जब नाम जप विश्वास भार
फिर होगा किसी दर कैसा।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा
अब राम बिराजे।।

मन मीट मेरे अवसर है याही
एक बार भजन में डूब सही।।

नयानो में बस ले छवि उनकि
हर और तुझे देखेंगे वही।।

जब मन श्री राम में राम ही गया
फिर विषय की ज्वार से दर कैसा।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा
जब राम बिराजे।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा।।

जब अमृत सागर नाम पिया
फिर जग की जहर से दर कैसा।।

जब राम बिराजे मन में मेरे
फ़िर घोर काली का डर कैसा ।।

मिलते-जुलते भजन...