आई थी आज गलियाँ मे एक ब्रज नारी रे
आई थी आज गलियाँ मे एक ब्रज नारी रे
मेरो अंग अंग पे श्याम श्याम लिख डारो रे।
आई थी आज गलियाँ मे एक ब्रज नारी रे
मेरो अंग अंग पे श्याम श्याम लिख डारो रे।।
माथे पे लिखे माया पति
हरदे पे हर घाट वासी
अधरन पे बंशी धर और
अँखियाँ पे लिखे अविनाशी हो हो।।
कानन पे कुंज बिहारी
गला गिरधारी रे
मेरो अंग अंग पे
श्याम श्याम लिख डारी रे।।
हाथो हरी सीने पे
छलिया गालो पे गोपाला
दातन पे दामोदर फिर
कंधे पे कृष्णा लिख डाला
नाभि पे नारायण के मैं प्यारी रे
मेरो अंग अंग पे श्याम श्याम लिख डारी रे।।
पहले पहचान ना कोई पाया
गुस्से में डोर बहाई
फिर आके पास वो बोली सब लाज का परदा
मैं नंद यशोदा की हू बड़ी दुलारी रे
मेरो अंग अंग पे श्याम श्याम लिख डारी रे।।
आई थी आज गलियाँ मे एक ब्रज नारी रे
मेरो अंग अंग पे श्याम श्याम लिख दोरो रे।।
