राम बिना सूना अंबर लागे
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे,
हनुमत बैठे नयन बिछाये, कब दर्शन दो मोहे रे,
सुने वन में ढूंढे हनुमाना, राम नाम बस गाये रे,
सीता मैया की याद में रोकर, अश्रु गंग बहाये रे,
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे।
पर्वत पूछे नदियां पूछे कहाँ गए रघुराई रे,
टूटी आस लिए बैठा सेवक, किसको पीर सुनाये रे,
चरण कमल की धूल जो पाई, वो सौभाग्य कहाँ पाए रे,
अब तो सुनी डगरिया सारी, मन मंदिर अकुलाये रे,
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे।
इसे भी देखें: ये चमक ये दमक सब कुछ सरकार तुम्हई से है
सीता मैया की ममता यादें, मन में दीप जलाये रे,
उनके कोमल वचन बिना अब हर ख़ुशी रुलाये रे,
राम लखन की छवि निहारे, मन हीं मन मुस्काये रे,
फिर विरह की ज्वाला उठती, भीतर हीं जल जाए रे,
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे।
सागर पर्वत धरा गगन सब, राम कथा दोहराये रे,
हनुमत का ये टुटा ह्रदय बस, नाम तुम्हारा गाये रे,
अयोध्या सूनी, वन भी सूना, सूना हर उत्सव सारा रे,
राम सिया बिन इस जग में अब, कौन बने उजियारा रे,
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे।
भींगे नयना कांपे काया, मन में दर्द समाये रे,
भक्ति की इस अग्नि में बजरंगी, खुद को रोज जलाये रे,
एक पुकार सुनो रघुनन्दन, सेवक द्वार पे आये रे,
सीताराम की दर्शन देकर, सूने प्राण बसाये रे,
राम बिना सूना अंबर लागे, मैया बिना मन रोये रे,
रोते-रोते थक गए नयना, फिर भी आस लगाए रे,
जय सियाराम जपते जपते, हनुमत शीश झुकाये रे,
समापन पंक्ति,
राम सिया बिन जग अँधियारा, हनुमत मन भरमाये रे।
