तुहीं बाहर तुहीं भीतर
आँख खुली तो तुहीं सामने, आँख मुंदी तो तुहीं अंदर,
कहाँ छुपूँ अब तुझसे साजन, तुहीं बाहर तुहीं भीतर।
भोर की पहली किरण जब फूटी, तुलसी के पत्तों पे ओस के बूंद,
मंदिर की घंटी कोयल की तान, हर सुर में तेरा हीं नाम सुना,
मैंने पुकारा था चुपके से, हवा ने तेरा जबाब दिया,
पंक्षी उड़े जब सूरज की और, मेरा भी मन उड़ा तेरी राहों में,
आँख खुली तो तुहीं सामने, आँख मुंदी तो तुहीं अंदर,
कहाँ छुपूँ अब तुझसे साजन, तुहीं बाहर तुहीं भीतर।
सावन की घटा जब बरसे जमीन पे, मिट्टी की सोंधी महक उठ आये,
ऐसे हीं तू बरसे मेरे मन में, आंसू बनके आँखों से बह जाए,
बादल गरजे बिजली चमके, पेड़ों के पत्तें काँप उठे,
इस तूफ़ान में तुहीं किनारा, तेरी छाँव में मिले सहारा,
नमक की गुड़िया समुन्दर में उतरी,
नापने चली थी पर खुद को हीं भूल गयी,
मैं भी ऐसे हीं तुझमें उतर जाऊं, फिर ना मैं रहूं ना ये दूरियां रहे,
दिये की लौ जब दिए से अलग, सोचे अकेली हूँ अधूरी हूँ,
पर लौ तो दिये की हीं जान है, मैं भी तुझसे हीं जुदा कहाँ हूँ,
माँ.. ओ माँ.. तुहीं पुकार , तुहीं जबाब माँ।
और इसे भी देखें : यही तो भजन है
पागल कहें लोग कहें दीवाना, मुझे तेरी हीं धुन सुनाई दे,
नाचूँ गाउँ रोऊँ और हँसूँ, हर सांस में बस तुहीं दिखाई दे,
हर गली हर मोड़ पे तुहीं मिले, हर चेहरे में तेरा हीं नक्श हो,
चांदनी में तू खुशबू में तू, ज़र्रा ज़र्रा बस तेरा हीं अक्श हो,
गंगा की धारा सागर में मिलती, फिर नाम गंगा का कहाँ रह जाता,
तुझ में मिलूं तो मैं मिट जाऊं,
बस तू रह जाए-०२
ना पूजा ना मंदिर, ना माला ना जप,
ना कोई दुरी ना कोई पुकार,
बस एक मौन एक गहरा मौन,
जिसमें तू है और कुछ नहीं-०२
