भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे दूर करो प्रभु दुख हमारे
रघुपति राघव राजाराम
पतितपवन सीताराम
जे रघुनंदन जे घनश्याम
पतितपवन सीताराम।।
भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे
दूर करो प्रभु दुख हमारे
दशरथ के घर जन्मे राम
पतितपवन सीताराम।।
विश्वामित्र मुनीश्वर आए
दशरथ भूप से वचन सुनाए
संग में भेजे लक्ष्मण राम
पतितपवन सीताराम ।।
वन में जाए तड़ाका मारी
चरण च्छुआए अहिल्या तरी
रशियों के डू:ख हारते राम
पतितपवन सीताराम ।।
जनक पूरी रघुनंदन आए
नगर निवासी दर्शन पाए
सीता के मान भाए राम
पतितपवन सीताराम ।।
रघुनंदन ने धनुष चढ़ाया
सब रजो का मान घटाया
सीता ने वार पाए राम
पतितपवन सीताराम ।।
परशुराम क्रोधित हो आए
दुष्ट भूप मान में हरशए
जनक राय ने किया प्रणाम
पतितपवन सीताराम ।।
बोले लखन सुनो मुनि ज्ञानी
संत नहीं होते अभिमानी
मीठी वाणी बोले राम
पतितपवन सीताराम ।।
लक्ष्मण वचन ध्यान मत दिजो
जो कुच्छ दंड दस को दिजो
धनुष तोड़यया हूँ मई राम
पतितपवन सीताराम ।।
लेकर के यह धनुष चढ़ाओ
अपनी शक्ति मुझे दिखलाओ
छुवत छाप चढ़ाए राम
पतितपवन सीताराम ।।
हुई उर्मिला लखन की नारी
श्रुतिकीर्ति रीपुसूदन प्यारी
हुई मांडव भारत के बम
पतितपवन सीताराम।।

