सिया ढूंढने वाले रघुनंदन
सिया ढूंढने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
गायिका – अंजलि जैन
सिया ढूंढने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
सबरी के घर की मेहमानी
भवन तुम्हें अब पाना है।।
ये कबसे नइयां तड़पते हैं
भगवान आपके दर्शन को।।
फिर कहो किस तरह जा सकते हैं
तोड़ के प्रेम के बंधन को।।
के दिन से राखे चाख चाख
ये बेर आपको खाना है।।
सिया ढूंढने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
सबरी के घर की मेहमानी
भगवान तुम्हें अब पाना है।।
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श्री राम का प्यारा है ये सीता का दुलारा
जिस जगह प्रेम बस्ता है वहा
क्या प्रेम राम बरसते है।।
सबरी से झूठे बेर मांग मांग
आज ये खाते हैं।।
कहते हैं बेर बेर प्रभुजी
बेरो में जिया हमारा है।।
सिया ढूढने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
सबरी के घर की मेहमानी
भगवान तुम्हें अब पाना है।।
सुन साबरी तेरे बेरो ने
क्या स्वाद अनोखे पाये हैं।।
ऐसे तो बेर नहीं हमने
कभी इस जीवन में खाए हैं।।
बेरो की इन बेरो की
बेरो की उपमा क्या मैं दू में
भगवान अपना खाना।।
सिया ढूढ़ने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
सबरी के घर की मेहमानी
भगवान तुम्हें अब पाना है।।
वो प्रेम वेग से पाके बेर
खा रहे राम हर्ष कर के।।
लक्ष्मण ने जो था समझा उनको
देखा प्रभु नज़र बच्चा कर के।।
कहे छोटे लाल अब मूड भाए
वही बेरो को खाना है।।
सिया ढूढने वाले रघुनंदन
अब मैं तुम्हें पहचान है।।
सबरी के घर की मेहमानी
भगवान तुम्हें अब पाना है।।
