आरती उतारू तेरी विनती ले सुन मेरी ओ हनुमंत

  • Aarti Utaru Teri Vinti Le Sun Meri O Hanumant

आरती उतारू तेरी विनती ले सुन मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत।।

आरती उतारू तेरी विनती ले मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत
आन पड़ी मैं तेरे द्वार।।

करदे तू बेड़ा मेरा पार बजरंगी
करदे तू बेड़ा मेरा पार।।

पूजा तेरी करने मैं
आरती का ताल लेके
श्रद्धा का दीप जलाऊँगी।।

सुन हनुमान बलि करियो जी भली मेरी
चरणों में शीश झुकोंगी।।

एक सच्चा नाम तेरा
दूजा सच्चा धाम तेरा।।

झुकता सब संसार
ओ हनुमत करदे तू बेड़ा मेरा पार।।

आरती उतारू तेरी विनती ले मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत।।

भक्तो में शिरोमणि
तेरी तो ही छाप पड़ी
मूर्ति में बैठा हुआ मौन तू।।

दुखिया बेचारी मैं हू
निर्धन नारी मैं हू
दुखड़ा ले हर बैठा मौन तू।।

अंखिया तो खोल बाबा
मुझसे तो बोल बाबा
सुनले तू मेरी भी पुकार।।

आरती उतारू तेरी विनती ले मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत।।

मेरे तन मन का तो हाल तुहि जानता
कर रही यही फरियाद मैं।।

नादिया में दोल जाऊं
चाहे कुछ मैं भूल जाऊं
तुझको तो करती हू याद मैं।।

आई हू मैं दर तेरे आओ प्रभु घर मेरे
जाो कभी दे के दीदार ओ हनुमत।।

आरती उतारू तेरी विनती ले मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत।।

तुम बिन कौन मेरा इश्स दुनिया में
तुमसे ही मेरे अरमान है।।

मन की कमाल काली खिली खिली
मुझको अर्ज़ मेरे ध्यान है।।

तुम बिन थोर नही तुम बिन और नही
नैया मेरी है मझधार ओ हनुमंत
नैया मेरी है मझधार।।

आरती उतारू तेरी विनती ले मेरी
आन पड़ी मैं तेरे द्वार ओ हनुमंत।।

करदे तू बेड़ा मेरा पार बजरंगी
करदे तू बेड़ा मेरा पार।।

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