जय जय भैरवी असुर भयाउनि
जय जय भैरवी असुर भयाउनि
पशुपति भामिनि माया ।
सहज़ सुमति वर दिऔ हे गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया ।।
हे रौद्र रूपा माँ काली, तुम्हारी जय जय कार है । असुरों को भय देने वाली शिव प्रिया की ही माया है जो इस जगत में व्याप्त है । हे देवी मैं सदगति को पाऊं अर्थात आपमें ही समाहित हो जाऊं, इसलिए आप हमें अपनी सरल, सहज़, सुन्दर, स्वच्छ मन प्राण और बुद्धि दें ।
वासर रैनि सबासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूड़ा ।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओ उगिलि कएल कूड़ा ।।
शवों से आच्छादित अँधेरी रात है, और शिव के मस्तक पर आपके चरण, चन्द्रमा की तरह सुशोभित हो रहे हैं। कितने ही असुरों को आपने चबा डाला और कितनो को उगल डाला जिससे कूड़े का अम्बार हो गया है।
सामर बरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फुलकोका ।
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि
लिधुर फेन उठ फोंका ।।
श्यामल बदन लाल लाल आँखें, काले घने मेघ भोर के सूरज के संयोग का आभास दे रहे हैं। चमेली के फूल की तरह सफ़ेद दाँत कटकाटते हुए होठों के मध्य चमक रहे हैं। उन्ही दांतों के बीच से रक्त फेन की भांति बाहर निकल रहे हैं।
घन-घन-घनन घुंघरू कत बाजय
हन-हन कर तुअ काता ।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरू जनि माता ।।
मेघ गर्जन की तरह घुँघरू बज रहे हैं और हनहनाती वायु से गतिमान तलवार भाग रही है। कवि श्रेष्ठ श्री विद्यापति जी स्वयं को माता के पुत्र बता रहे हैं एवं माँ से विनती कर रहे हैं की वो अपनी कृपा बनाये रखें, अपने पुत्र को कभी ना भूलें।
