चलो रे हंसा उस देशवा I संत कबीर का अंतिम भजन
कहतें हैं जब संत का अंतिम समय आया तो उन्होंने काशी छोड़ दी,
लोगों ने कहा काशी में मुक्ति मिलेगी,
कबीर बोले सत्य किसी स्थान का मोहताज नहीं होता,
राम भोरसे वे मगहर पहुंचे, जहाँ अंतिम दिनों में एक चमत्कार घटा,
इन्हीं अंतिम दिनों कि पूरी कथा इस भजन में बयां हुई है।
चलो रे हंसा उस देशवा, जहाँ काल ना पहुंचे कोए,
काशी तज कबीर चला, मगहर में विश्राम होए,
चलो रे हंसा उस देशवा, जहाँ काल ना पहुंचे कोए।
श्री कृष्ण भगवान की प्यारे-प्यारे भजनों का संग्रह
लोग कहे जो काशी मरे, मुक्ति सहज हीं पाया,
मगहर मरे सो गधा होए, कबीर हंसे मन माया,
राम भरोसे मैं चला, जो होनी सो होए,
अन्धविश्वाश कि बेल को, काटूंगा अब सोए,
काशी छोड़ी गंगा छोड़ी, छोड़ा मान सम्मान,
मगहर कि उस उसर माटी में, बस गए भगवान,
चलो रे हंसा उस देशवा, जहाँ काल ना पहुंचे कोए।
हिन्दुअन बोले जलाएंगे हमारा है ये संत,
मुस्लमान बोले दफ़नायेंगे यही हमारा अंत,
तलवारे खींच गयीं म्यान से, आँखों में था रोष,
भूल गए गुरु की सीख को, खो बैठे सब होश,
मेरा तेरा कि रटन में, झगड़ा हुआ अपार,
तभी गुंजी एक अनहद नद, खुली सत्य कि द्वार-०२
हटाओ चादर देखो तो, कौन पड़ा है नीचे,
क्या हाड़ मांश का पुतला है, जो आँखे अपनी मीचे,
जब चादर सरकी धीरे से, अचरज हुआ महान,
ना देह मिली ना लहू मिला, ना जग का कोई निशान-०२
ओ ओ ओ ओ ओ…
ओ ओ ओ ओ ओ…
ना देह मिली ना लहू मिला, ना जग का कोई निशान,
वहां पड़े थे ताजे फूल, महक उठी चहु ओर,
जैसे भोर कि लाली छायी, मिटा अँधेरा घोर,
हिन्दुअन ने कुछ फूल लिए, दी अग्नि को भेंट,
मुस्लमान ने कुछ फूल लिए किया माटी से पेट,
एक हीं डाली के दो फूल, दो राहों पर चले,
एक समाधी बनी वहां, एक मजार के तले,
चलो रे हंसा उस देशवा, जहाँ काल ना पहुंचे कोए,
जहाँ काल ना पहुंचे कोए, जहाँ काल ना पहुंचे कोए,
कहे कबीर सुनो भाई साधो, ये है राम की माया,
फूलों में जो समा गया, वही तो अमर काया।
झूठा जग का झगड़ा झमेला, झूठी है ये काया,
कबीर तो केवल शब्द था, जो शब्द में हीं समाया,
ना ना ना ना ना…
ना ना ना ना ना…
ना ना ना ना ना…
साधु ये जग रेन बसेरा, रहना नहीं यहाँ कोय,
जैसे कबीर फूलों में बदला, तुम भी वैसे होय,
दासन दस कबीर खड़ा है, लिए सत्य की लव,
फूल बने जो द्वेष मिटाये, वही शिष्य है सव,
चलो रे हंसा उस देशवा, जहाँ काल ना पहुंचे कोए,
जहाँ काल ना पहुंचे कोए।
